हिंदी पत्रकारिता के विकास यात्रा में महिलाओं के प्रश्न - प्रत्युष प्रशांत


हिंदी पत्रकारिता के विकास-यात्रा में बीसवी सदीं का नवां दशक एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक ऎसा प्रस्थान बिंदु है जिसके पहले की हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप अलग था और इस दशक के आते-आते हिंदी पत्रकारिता अलग रूप से अभिव्यक्त होने लगी(महिलाओं के जुड़े विषयों के संदर्भ मे)। इस दशक के हिंदी पत्रकारिता में जहां कुछ सकारात्मक प्रभाव दिखता है तो काफी हद तक नकारात्मक प्रभाव भी दिखते है। यह प्रभाव समाज के अन्य वर्गों के साथ-साथ एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे हम आधी आबादी के नाम से जानते है, को सबसे अधिक प्रभावित किया है। इन साकारात्मक और नाकारात्मक प्रभावों में महिलाओं के प्रश्नों के साथ मूल्यांकन करने का प्रयास करते है तो यह स्पष्ट रूप से दिखता है कि जाति और धर्म ऎसे संवेदनशील विषय है जो महिलाओं के प्रश्न को प्रभावित करते रहे हैं या जाति और धर्म से जुड़ी मान्यताएं महिलाओं के जीवन को नियंत्रित भी करती है। इसका प्रभाव औपनिवेशिक हिंदी पत्रकारिता पर भी था और आजादी के बाद के हिंदी पत्रकारिता इससे मुक्त नहीं हो पाई, जिसके कारण पत्रकारिता लोकतंत्र के चौथे खंभे होने का जो दावा करती है उस दावे को पूरा नहीं कर पाती है। जाति और धर्म जैसे विषयों के साथ-साथ समंय अंतराल में हिंदी पत्रकारिता में कुछ नये संदर्भ जुड़ते चले गए, जिसने महिलाओं के प्रश्नों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित किया है। जैसे आर्थिक गतिशीलता के प्रभाव, सामाजिक न्याय के कारण जातीय गतिशीलता और सांप्रदायिक दवाब के महौल में हिंदू पत्रकारिता का प्रभाव। इन नये संदर्भों के साथ जब हम महिलाओं के प्रश्नों को देखते है तो स्थिति काफी परेशान करने वाली दिखती है। इनपर हल्के से विचार नहीं किया जा सकता है क्योंकि इसके साथ चलने वाले पूर्वाग्रह भारतीय समाज के जनचेतना पर स्थूल तरीकें से चलनी वाली चीजें है। इसके जो शक्ति संबंध है हमारी चेतानाओं में जिंदा रहते है और इससे मुक्त होने कोशिश में भी हम इससे मुक्त नहीं हो पाते है। परिणामस्वरूप हिंदी पत्रकारिता अपने लोकतांत्रिक होने के दावे से छिटक जाती है या दूर चली जाती है।
इन शक्ति संबंधों को ध्यान में रखते हुए जब हम औपनिवेशिक काल में हिंदी की पहली महिला पत्रिका बाला-बोधनी का मूल्यांकन करने की कोशिश करे। जिसका संपादन भारतेंदु हरिशचंद्र ने 1874 में किया। इस पत्रिका के अंर्तवस्तु में महिलाओं के स्वतंत्रता को बाधित करने वाली चीजें अधिक दिखती है। महिलाओं के संदर्भ में भारतेंदु या भारतेंदु मंडल की चिंता महिलाओं के अशिक्षित होने और अंधविश्वासों के शिकार होने को लेकर अधिक दिखती है। इसकें अंर्तवस्तु में महिलाओं को अपने स्वायत दायरे या महिलाओं का निजी दायरा[1] पर नियंत्रण की कोशिश दिखती है। बालबोधनीपत्रिका के दूसरे और तीसरे अंक में शीलाबंती नाम के लेख में माध्यम से महिलाओं के आदर्श गुणों को स्थापित करने का प्रयास भी दिखता है। मसलन, शीलवंती के माध्यम से उन तमाम गुणों को गिनाया गया जो वो अपने ओर से महिलाओं के आदर्श गुण मानता है ये आदर्श गुण है कि वो राम चरित्र मानस पढ़ सकती है यानी वो साक्षर है, कभी भी बड़ों के सामने और पति के सामने सिर उठाकर बात नहीं करती है, अपने घर के कामों में व्यस्त रहती है और जब थक जाती है तो बड़े-बूढ़ों से धर्म ग्रथों पर बात करती है। इन रचनाओं के आधार पर हम यह कह सकते है कि भारतेंदु भारतीय महिलाओं को एक खास तरह के फ्रेंम में या सांचे में डालने का प्रयास कर रहे थे।[2] परंतु, भारतेंदु द्दारा संपादित दूसरी पत्रिका को देखे तो एक दुचित्तापन उनके लेखन में दिखता है। मसलन, भारतेंदु अपनी संपादित दूसरी पत्रिका कवि वचन सुधामें भ्रूण हत्या के समस्या पर एक शानदार लेख लिखते है जिससे उनको काफी आलोचना झेलनी पड़ी। वो विधवा विवाह के प्रश्नों पर और मनु की उस व्यवस्था पर भी लिखते है जिसमें महिलाओं को बच्चा पैदा करने की कई विधान है, उस पर चर्चा मिलती है। वह सह-शिक्षा के बारे में लिखते है कि इसके लिए भारतीय समाज अभी पूरी तरह से तैयार नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि भारतेंदु अपने समय में बहुत सारे ऎसे कार्य कर रहे है जिसके लिए समाज तैयार नहीं था। पर जिस स्तर तक समाज को तैयार किया जा सकता है उस स्तर तक अपनी बात कहने का प्रयास भी कर रहे थे।
आदर्श स्त्री छवि के मामलों में हिंदू और मुसलमान लेखकों में वैचारिक समानता देखने को मिलती है। बीबी तहरून्निसा जिनको पहली भारतीय महिला मुसलमान गद्द-लेखिका के रूप में भी जाना जाता है उनका निबंध 1865 में बामाबोधनी पत्रिका में एक लंबे निबंध में पर्दे के भीतर स्त्री-शिक्षा की वकालत करती है। उनकी रचना शरीफ़ बेटी, सफ़िया बेगम, आजकल, चंदन हार में मुसलमान औरतों के लिए आचरण की शिक्षा दी गई है।[3] यह प्रयास 1909 के आस-पास बैगम रूकैया के कर्म और लेखन में भी देखने को मिलता है, जहां वो मुस्लिम महिलाओं के शिक्षा के लिए तमाम नियम कायदों का सख्ती से पालन कर रही थी और स्त्री-पुरुष असमानता तीखा प्रहार भी कर रही थी।[4]
इन तमाम आधार पर यह कहा जा सकता है कि इस दौर के हिंदी पत्रकारिता में परंपरा पोषक समाज और आधुनिकता का द्दंद उस दौर के तमाम समाज सुधारकों और बुद्दिजीवियों के लेखन में भी दिखता है। पर इस द्दंद में भी मानवतावादी विचारधारा ने व्यक्तिगत और सामाजिक आचार के आधार पर महिलाओं के लिए उस तरह की सामग्री महिला पत्रिका में लाने का प्रयास कर रहे थे जिससे महिलाओं को बहुत पहले ही वंचित कर दिया गया था। महिलाओं के निजी और सार्वजनिक जीवन के प्रश्नों पर परंपरा-पोषक समाज की नैतिकता और आधुनिकता का द्दंद उस समय कई प्रसिद्ध घटना में भी देखने को मिलता है। इससे उस दौर के समाज सुधारक और बुद्धिजीवियों के द्दंद या दुचित्तापन्न को समझा जा सकता है। जिसकी अभिव्यक्ति हिंदी पत्रकारिता में देखती भी है मसलन, महराजा लाइबल केस[5], फूलमती दासी के मामले में[6], रख्माबाई के मामलों में[7], मुंशी बजलुर रहीम बनाम शम्सुन्निसा बेगम के मामले[8] में भी देखने को मिलता है। इन तमाम मामलों में हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं के स्थिति में सुधार से अधिक जोर बनी हुई व्यवस्था को कायम रखने में अधिक था। इन तमाम मामलों की एक खास बात यह है कि उस दौर के पुरुष समाज सुधारक जो पहले से तय मान्यताओं के आधार पर महिलाओं के साथ हो रहे शोषण, जाति और धर्म आधारित कर्मकांडों का विरोध तो कर रहे थे। परंतु, जब इन कर्मकांडो का विरोध स्वयं महिलाओं के द्दारा किया जा रहा था तो इन सुधारकों ने न ही महिलाओं को अपने आंदोलन अगुवा बनाया और न ही उनके आंदोलनों का समर्थन ही किया। वास्तव में उनकी चिंता इन कुरतियों से अपने परिवार या समुदाय के महिलाओं को बचाने भर का था, क्योंकि अगर कोई ऎसी घटना उनके परिवार या समुदाय की महिलाओं के साथ होता है तो समाज में उनकी बड़ी बदनामी होती थी। मणिकबाई[9] का मामला ऎसा ही उदाहरण है। इसतरह की स्थिति रक्माबाई के मामले में भी देखने को मिलती है। कहने का आशय यह है कि जनता को राजनीतिक अथवा वर्ग चेतना को ललकारने के बजाए तमाम समाज सुधारक मान्यताओं तथा इस तरह की भावनाओं की दुहाई  देते थे। एक ओर तो वे धर्म और समाज सुधार को राजनीति से अलग रखना चाहते थे, दूसरी ओर वे परंपरागत रस्म रिवाजों का अनुसरण करने पर जोर देने से नहीं चूकते थे। यही स्थिति आजादी के बाद भी कई मामलों में देखने को मिलता है। मसलन, शाहबानों का मामला, इमराना का मामला और अन्य कई मामले है जैसे नर्गिस मिर्जा मामला, सुब्बालक्ष्मी का विवाद.. केपी एस गिल बनाम रूपन देओल बजाज आदि में दिखता है जहां महिलाओं के निजी और सार्वजनिक जीवन की समस्या गौण हो जाती है और धर्म\जाति मूल या पहले से तय नियम-कायदों को अधिक महत्व हो जाता है।
औपनिवेशिक दौर में इन समाज सुधारकों के परंपरा पोषक और आधुनिकता के द्दंद और महिलाओं के प्रश्न पर उनके प्रयासों को कटघरे में रखते हुए ताराबाई शिंदें अपनी किताब स्त्री-पुरुष तुलना में जिक्र करती है। जिसके आधार पर वीरभारत तलवार, रोजालिन ओहालन के हवाले से कहते है कि भद्रवर्गीय पुरुषों के सुधार आंदोलन ने समाज का चरित्र और ज्यादा ब्राहणवादी बना दिया। उन्होंने समाज को और पारंपरिक बनाने में भूमिका अदा की। भद्रवर्गीय पुरुष सुधारकों के कई विचार महिलाओं को नए सिरे और ज्यादा मर्यादाओं में बांधते थे।[10] हालांकि रोजालीन के यहां सुधारकों के परंपरा पोषक और आधुनिकता के अंतविरोधों की गतिशीलता की अनदेखी मिलती है क्योंकि बदलाव की शक्तियों को ज्यादा दिन तक रोक पाना किसी भी समाज के लिए मुमकिन नहीं होता है। क्योंकि परिवर्तन की द्दंदात्मक प्रवृत्ति चाहे-अनचाहे में कहीं न कहीं अपनी जगह बना लेती है। परंतु, बदलाब की इस बयार का मूल्यांकन हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं के संदर्भ में जरूरी है।
मसलन, 1920-40 के दौरान जब हिंदी के सार्वजनिक क्षेत्र में शिक्षित महिलाएं उभर कर आ रही थी और नये-नये कोणों से महिलाओं के हैसियत को लेकर सवाल उठाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना शुरू किया या महिलाओं की भूमिका को नए सिरे से परिभाषित करने का काम शूरू किया। इस दौर में स्त्रियों पर केंद्रित पत्रिकाओं ने स्त्रियों को सिखना या सुधारना से बदल कर उनकी ओर से समाज को सुधारना था। इस तरह के प्रयास चांद, गृहलक्ष्मी, सृगृहणी, गृहशोभा, स्त्री दर्पण और कई पत्रिकाओं में देखने को मिलता है। सारी महिलाओं का प्रतिनिधित्व करने के दावे के ने दूसरी महिला समूहों को चुपकों से अपने दायरे के बाहर कर दिया गया। यानी, इस दौर के पत्रकारिता की भी अपनी एक सीमाएं बनी हुई थी वह महिलाओं की अनुभवों को स्वर देने का प्रयास तो कर रहा थी। परंतु, इन अभिव्यक्तियों में वंचित समुदाय की महिलाओं की हिस्सेदारी जिसमें निरक्षर महिलाएं, खेतों,चाय-बगानों और मिलों में काम करनी वाली महिलाएं और अन्य कई तरह की महिलाएं भी शामिल थी नहीं के बराबर थी।[11] इन्हीं प्रवृतियों को मूल्यांकन करते हुए अभय कुमार दुबे बताते है कि औपनिवेशिक दौर के राष्ट्रवादी विमर्शों में मध्यवर्गीय महिलाएं या भद्रवर्गीय महिलाओं कि बातें हो रही थी जो अपने घरों के दायरों में कैद थी और सम्मानपूर्वक जीवन के लिए महत्वकांक्षी थी। इसमें महिलाओं का एक बड़ा तबका पूरी तरह से गायब था।
इस तरह से औपनिवेशिक काल में हिंदी पत्रकारिता के विकास यात्रा में पहले परंपरा और आधुनिकता का द्दंद और बाद में मध्यवर्गीय समाज के मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता की तरफ झुकी हुई दिखती है। तो स्वतंत्रता के बाद भी मुख्य धारा की पत्रिकाएं या अखबार बड़े पैमाने पर मध्यवर्गीय संस्कॄति की वाहक के रूप में दिखती है। एक तरफ, परंपरा और आधुनिकता का द्दंद महिलाओं को समुदाय या परिवार के इकाई के रूप स्थापित करने की कोशिश करता है।[12] दूसरी तरफ, जातीय और धार्मिक मान्यताओं ने महिलाओं की गतिशीलता को नियंत्रित किया। इन मध्यवर्गीय नैतिकताओं और जातीय और धार्मिक मान्यताओं में दमित और वंचित समुदाय की महिलाओं के सवाल को अभी भी हिंदी पत्रकारिता उस तरह से अभिव्यक्त नहीं हो रही थी जिसकी वो मांग करती है। अगर कभी वो अभिव्यक्त होती भी है या बहस का हिस्सा बन पाती है तो ऎसा इसलिए होता है क्योंकि वो राजनीतिक प्रश्न के रूप में अपनी जगह बना पाती है।[13] हिंदी पत्रकारिता की यह प्रवृत्ति उसके वर्गीय चरित्र के तरह इशारा करती है। हिंदी पत्रकारिता के वर्गीय चरित्र के संदर्भ में यह समझना जरूरी है कि हिंदी पत्रकारिता में अभिव्यक्त हो रही बहसें स्त्री और पुरुष के रूप में विभाजित होती हुई दिखती है। स्त्री समुदाय के अंदर भी सांस्कॄतिक, सामाजिक और आर्थिक आधार पर श्रेणीबद्धता हो सकती है इस मत को न ही औपनिवेशिक दौर के हिंदी पत्रकारिता ने स्वीकार किया और न ही आज की पत्रकारिता में इसकी कोई प्रासंगिकता है। स्त्री वर्ग की समस्या को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से पहचाना ही नहीं गया है। इसलिए राजनीतिक रूप से महिलाओं की समस्या संवेदनशील होने पर ही विमर्श के केंद्र में स्थापित हो पाती है। परंतु, इन प्रयासों में भी वचित समुदाय के साथ हिंसा की खबरों को ग्लोरिफाई अधिक किया जाता रहा है।[14] हाल के दिनों में वंचित समुदाय के महिलाओं के शोषण और उत्पीड़न की घटनाओं में तस्वीरों और नाम के साथ समाचारों की अभिव्यक्ति परेशान करने वाला है। जिसमें पत्रकारिता के नैतिकता के सारे मूल्य को ही भूला दिया गया है। महिलाओं कि इन तरहों की अभिव्यक्ति को ध्यान में रखते हुए सुधीश पंचौरी बताते है कि मीडिया के अभिव्यक्तियों में दो तरह कि महिलाओं की छवि देखने को मिलती है इसमें एक पीड़िता की छवि है तो दूसरी रक्षिता की है।
इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं के जुड़े कई विषयों को मुखर अभिव्यक्ति नहीं दी। परंतु, जब हम इन अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन करते है तो कई इन साईट देखने को मिलते है। मसलन, बलात्कार, दहेज, यौन-शोषण और घरेलू हिंसा जो अब तक महिलाओं के निजी दायरे में कैद थी। हिंदी पत्रकारिता ने इन विषयों को सार्वजनिक बहस के रूप में सतह पर लाने की कोशिश की। परंतु, महिलाओं के जुड़े प्रश्नों को हिंदी पत्रकारिता कभी-कभी क्रांतिकारी भूमिका में दिखता है तो कई बार महिलाओं के जुड़े प्रश्न यथास्थितिवाद के करीब पहुंची दिखती है जिसके दायरे में महिलाओं के समानता और स्वतंत्रता के सवाल या तो दबा दिए जाते है या उनको बहस के रूप में स्थापित नहीं किया जाता है जिसकी वो मांग करती है। इसी तरह अगर मंडल आयोग की सिफारिश के दौर में सामाजिक न्याय के संदर्भ में हिंदी के अखबारों में बहुपक्षीय लेखन देखने को मिलता है पर यही सामाजिक न्याय के प्रश्न महिलाओं के साथ जोड़ा गया तो हिंदी के अखबारों में चुप्पी छा गई। वास्तव में महिलाओं की समस्याएं वर्गीय आधार पर विश्लेषण की मांग करती है। परंतु, अक्सर वह पुरुष और महिला वर्ग के आधार पर विभाजित हो जाता है और आधी आबादी के अंदर भी एक वर्गीय चेतना हो सकती है यह कभी भी स्थापित ही नहीं हो पाता है। सांप्रदायिक दंगों के आगजनी में सांप्रदायिक हिंसा को नोटिस किया जाता है। परंतु, सांप्रदायिक दंगों का महिलाओं पर पड़ने वाले प्रभावों पर हिंदी के अखबार चुप्पी साध लेते है या उसे विमर्श का हिंसा बनने ही नहीं देता। इसके साथ-साथ उन विषयों पर धराप्रबाह लेखन देखने को मिलता है जो महिलाओं को एक उत्पाद के रूप या कमोडेटी के रूप में स्थापित करने का प्रयास करता है। जैसे, महिलाएं सुंदर कैसे दिखे? महिलाएं परिवार को संतुलित कैसे रख सकती है वगैरा-वगैरा......यहां एक बात नोटिस की जा सकती है कि महिलओं के हर प्रश्नों के साथ हिंदी के अखबार अगल-अगल भूमिका में अपने को अभिव्यक्त करते है जैसे कि कामकाजी महिलाओं के संदभे में हिंदी के अखबार महिलाओं के क्षमता और उनकी उपलब्धियों को अभिव्यक्त करते है पर कामकाजी महिलाओं के अधिकार के प्रश्न पर या कामकाजी महिलाओं के उत्पीड़न और शोषण के संदर्भ में पूर्वाग्रह सामने आने लगते है। कभी-कभी महिलाओं से जुड़े प्रश्नों का एकरूपीय तरीके से अभिव्यक्त किया जाता है जबकि महिलाओं के प्रश्न वर्ग, जाति और धर्म की श्रेणीबद्धता में अलग-अलग तरह के है। (इसके साथ-साथ मौजूदा समय में हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं के कई प्रश्न लगभग गायब हो चुके है मसलन वेश्यावृति की समस्या, दहेज, घरेलू हिंसा और बलात्कार के विषय जिसकी पहचान हिंदी पत्रकारिता ने कभी की थी और सार्वजनिक दायरे में बहस का विषय के रूप में स्थापित भी किया था।)
इन विश्लेषणों के आधार पर हम इस निष्कर्ष के आस-पास पहुंच सकते है कि हिंदी पत्रकारिता में महिलाओं के प्रश्नों का मूल्यांकन पिछड़ेपन और विकास का मिला-जुला मिश्रण है। महिलाओं से संबंधित मुद्दों की मुख्य समस्या एकीकॄत कार्यवॄत नहीं है वरन विभिन्न पहचानों के आधार पर मांगों का निर्माण है। सामाजिक बदलाव के नियामक और समाजिक यथास्थिति के परंपरागत मूल्य दोनों ही महिलाओं को पिछड़ेपन और विकास की ओर ढकेलते है। कई महिला आंदोलनों ने और स्वयं महिलाओं ने स्त्री-पुरुष असमानता के सवाल को उठाया और नये तरीके से पुन: परिभाषित भी किया है। चूंकि भारतीय स्त्री-पुरुष असमानता वर्ग, जाति, धर्म और कई तरह के पूर्वाग्रही मानसिकता पर आधारित है। इसलिए लोकतंत्र के चौथे खंभे के रूप में मीडिया कि जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है कि वह महिलाओं के प्रश्नों को समग्रता में समझे और प्रसारित करें। पंरतु, मीडिया संस्थानों की धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रतिबद्धता सूचना के माध्यम को प्रभावित करती है। यह शोध पत्र हिंदी पत्रकारिता के विकास यात्रा में हो रहे बदलावों में बदलते हुए सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदॄश्य में भारत में महिलाओं और उनसे जुड़े सवालों का आकलन करने का एक छोटा सा प्रयास है जिससे हम जटिल संरचना और निर्मितियों को समझ सके और महिलाओं के सम्मानपूर्ण जीवन के लिए समुचित रणनीति का विकास कर सकें। महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अतीत और वर्तमान के हिंदी पत्रकारिता में खंगालते हुए यह शोध पत्र यह दिखाने का प्रयास है कि महिला किन जटिल परिस्थितियों में नियोजित व अनियोजित हर क्षेत्र में समानता और स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रही है और निरंतर संघर्ष कर रही है।



[1] मसलन, महिलाओं का मंदिरों में प्रवेश से रोक, तीज त्योहार जैसी अंधविश्वासी चीजों को नहीं करने की सिफारिश, मेले ठेले में महिलाओं के जाने पर पाबंदी, निम्न जातियों के महिलाओं से कार्य-व्यवहार नहीं करने की कोशिशे, इसकी चर्चा चारू गुप्ता भी अपने काम में करती है।
[2] जिसके आधार पर वसुधा डालियिमा और तनिका सरकार या कई लोगों ने अपनी प्रतिस्थापना भी दिया है कि इस दौर के समाज सुधारक या बुद्धिजीवी महिलाओं को एक पारिवारिक इकाई में ढालने की कोशिश कर रहे है और महिलाओं के आदर्श गुणों की स्थापना कर महिलाओं को एक दायरे(घर-गॄहस्थी) में बाधने का प्रयास कर रहे थे। बाला बोधनी जैसी महिला पत्रिका के अंतवस्तु के आधार पर मैं भी इस प्रतिस्थापना के खुद को करीब पाता हूं। यहां एक बात मैं जोड़ना चाहूंगा जो मौजूदा वक्त में हिंदी पत्रकारिता में देखने को मिलती है वो है हिंदी के अखबारों या पत्रिकाओं में महिलाओं के लिए सुंदर दिखने या खान-पीने या बागवानी को लेकर जो सांमग्री देखने को मिलती है इसकी प्रेरणा औपनिवेशिक दौर मे महिलाओं को दायरे में कैद करने की विचारधारा से मिलती है जहां महिलाओं को घर-गृहस्थी तक सीमित करने की कोशिश होती थी। मौजूदा दौर में महिलाओं के लिए केवल इस तरह की सामग्री का प्रकाशन अधिक होता है, जिसमें वह सिर्फ एक आवश्यकता है। इस तरह की अभिव्यक्तियां महिलाओं से जुड़े अन्य प्रश्नों प्रासंगिकता को कम करते या विमर्श का हिस्सा नहीं बनने देते है।
[3] गरिमा श्रीवास्तव, नवजागरण,स्त्री-प्रश्न और आचरण-पुस्तकें,प्रतिमान जुलाई-दिसबंर, वर्ष-2, खंड 2, अंक 2 पेज न०-707
[4] जेरल्डीन फोब्स, स्त्रियों के लिए शिक्षा, निरंतर 2010, अप्रैल,155
[5] यदुनाथजी महराज ने कटसनदास मूल जी पर मानहानि का मुकदमा किया था। जिसका आधार यह था कि कटसनदास मूल जी ने यदुनाथजी महराज पर यह आरोप लगाया था कि इन महराजाओ, गोसाई के द्दारा मानवताविरोधी कई कर्म होते है जो मूल धर्म से अलग है। यह मामला अदालत में गिर गया था और अदालत ने यह व्यवस्था दी कि मानवताविरोधी ये प्रयोग बंद होने चाहिए क्योंकि ये मूल धर्म को बदनाम करते है।
[6] फूलमनी दासी 10 वर्ष की बाल वधु थी, जिसका अभी तक यौनवारंभ नहीं हुआ था, जब उसका उम्रदराज पति उसके साथ जबरदस्ती कर रहा था तो अत्यधिक रक्तस्रवा से उसकी मृत्यु हो गई।
[7]  रख्माबाई 11वर्ष के उम्र में दादाजी से शादी कर दी गई थी। उदार वातावरण में पले होने के कारण, रख्माबाई ने दादाजी के साथ रहने से मना कर दिया। बाद में दादाजी न्यायलय गए और न्यायालय में दावा किया विवाह के बाद पत्नी साथ रहे। न्यायालय ने वादी को मदद प्रदान नहीं की। न्यायालय का यह निर्णय भारतीय समाज में उथल-पुथल का कारण बना।
[8]  यह एक मुस्लिम मामला था, जिसमें एक व्यक्ति ने पांच बच्चों वाली एक धनवान विधवा को उसके पति की मृत्यु के छह महिने बाद झांसा में फंसाकर उसके साथ विवाह कर लिया था। बे कुछ वर्षों तक साथ में रहे और इस बीच उस व्यक्ति ने धोखे से औरत की दौलत का एक हिस्सा हड़प लिया। इसके बाद वह उसके साथ दुर्व्यवहार करने लगा और उसने उसे घर में लगभग बंदी बनाकर रख। काननी हस्तक्षेप के बाद वह महिला पति का घर छोड़कर अलग रहने  लगी। बाद में उस व्यक्ति ने वैवाहिक अधिकारों के लिए मुकदमा दायर किया।
[9] औपनिवेशिक देशकाल में गुरू-भक्त परंपरा में या गोसाई परंपरा में, जिसमें गुरु अपने शिष्यों से अन्न,वस्त्र और धन दान में लेते थे और कभी-कभी भक्तों के महिलाओं के तन का दान भी लेते थे और बताते थे कि ये दान उनको अर्पण नहीं किया जा रहा है प्रभु को अर्पण किया जा रहा है। यह एक तरह का प्रभु अर्पण है। मणिक बाई ने इसका विरोध किया था।
[10] वीर भारत तलवार, 19वीं सदी में स्त्री-चेतना और ताराबाई शिंदे, स्त्री-पुरुष तुलना अनुवाद जुई पालेकर, संवाद प्रकाशन, मेरठ पेज न० 44
[11] इस प्रयासों के बारें में फ्रेंचेक्का आंर्सीनी, तनिका सरकार, जी. पीर्यसन और कई इतिहासकार मूल्यांकन करते हुए नोट करती है कि प्रगति-पथ सामाजिक और जातीय उत्पीड़न के खिलाफ विभिन्न मोर्चो और स्त्री और देश मुक्ति के पक्ष में जोशीले अभियानों से लेकर एक ऎसी संयमित, शहरी मध्यवर्गीय संस्कृति को ठोस रूप देने तक खिसकता रहा था जो उच्च-जाति की आर्थिक रूप से सुखी, शिक्षित, गृहणी की अस्मिता को प्रतिबिम्बित करती थी। ये पत्रिकाएं महिलाओं के जिन विषयों को उठाती थी, वे शहरी उच्य या मध्य जाति की महिलाओं के थे जो पक्की तौर पर मध्यवर्गीय थीं।
[12] जिसकी चर्चा कमला भसीन वीमेन,डेवेलपमेंट एंड मीडियाऔर विधा बल वीमेन्स मैगजीन्स –ए पांजेटिव रांलमें करती है कि आजादी के बाद हिंदी पत्रकारिता ने महिलाओं की एक स्वतंत्र व्यक्तित्व के रूप में पेश करने में झिझक महसूस की। हिंदी पत्रकारिता ने गृहणियों और कामकाजी महिलाओं को भी पारिवारिक इकाई के रूप में पेश करने की कोशिश ज्यादा रही।
[13] हालांकि कई लोग हिंदी क्षेत्र में सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन और सत्ता में वंचितों की भागीदारी से हो रहे बदलावों के तरफ इशारा करते है। परंतु हिंदी क्षेत्र के हिंदी पत्रकारिता में यह परिवर्तन दूर की कौड़ी लाने जैसा है। क्योंकि हिंदी पत्रकारिता में वंचित तबकों की भागीदारी काफी सीमित है और जो है वो मध्यवर्गीय मूल्यबोध से बंधी हुई है।
[14] हाल के दिनों में वंचित समुदाय के साथ हिंसा की खबरों को जिस तरह अभिव्यक्त किया जा रहा है वो काफी परेशान करने वाला है जैसे जिस महिला के साथ हिंसा की घटना होती है उसकी तस्वीरें, नाम को छापने में किसी भी नैतिकता का ध्यान नहीं दिया जाता है, जो पत्रकारिता के आचार संहिता के विरुद्ध है।

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